4464005860401745 प्रेमानंद महाराज हिन्दू धर्मगुरु (जन्म: 1969) सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

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प्रेमानंद महाराज हिन्दू धर्मगुरु (जन्म: 1969)

 

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प्रेमानंद महाराज

हिन्दू धर्मगुरु (जन्म: 1969)

प्रेमानंद गोविंद शरण (जन्म: अनिरुद्ध कुमार पांडेय; 30 मार्च 1971), जिन्हें सामान्यतः प्रेमानंद महाराज के नाम से जाना जाता है, उत्तर प्रदेश के वृन्दावन में निवासरत एक भारतीय हिन्दू तपस्वी एवं आध्यात्मिक गुरु हैं।[1][2] वह राधा वल्लभ सम्प्रदाय के दीक्षित भिक्षु (संन्यासी) हैं। यह सम्प्रदाय एक वैष्णव पंथ है जो हिन्दू देवी-देवता राधा-कृष्ण की भक्ति पर बल देता है, तथा जिसमें विशेषकर देवी राधा की सर्वोच्चता पर धर्मशास्त्रीय ध्यान केंद्रित किया गया है।[3]

प्रेमानंद गोविंद शरण

प्रेमानन्द महाराज अपने शिष्यों के साथ
जन्मअनिरुद्ध कुमार पांडे
30 मार्च 1971 (आयु 55)
अखरी ग्राम, सरसौल, कानपुर जनपद, उत्तर प्रदेश, भारत
राष्ट्रीयताभारतीय
पेशाआध्यात्मिक गुरु, संन्यासी, दार्शनिक
पदवीश्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज, प्रेमानंद जी महाराज
प्रसिद्धि का कारणआध्यात्मिक प्रवचन (सत्संग), 'एकांतिक वार्तालाप', राधा-कृष्ण की भक्ति
धर्महिन्दू धर्म
माता-पिताशंभू पांडे (पिता)
रमा देवी (माता)
वेबसाइट
vnitakasnia@gmail.com

वे वृन्दावन स्थित अपने आश्रम, श्री हित राधा केलि कुंज में सार्वजनिक आध्यात्मिक प्रवचन (सत्संग) और 'ऐकान्तिक वार्तालाप' के नाम से ज्ञात निजी प्रश्नोत्तर सत्र आयोजित करते हैं।[4] 2010 के दशक के उत्तरार्ध और 2020 के दशक के प्रारम्भ में, उनके प्रवचनों के वीडियो (दृश्य-श्रव्य रिकॉर्डिंग) यूट्यूब जैसे डिजिटल मंचों पर लोकप्रिय हुए, जिससे युवा वयस्कों और शहरी व्यवसायियों का एक बड़ा वर्ग उनकी ओर आकर्षित हुआ।[5] वृक्क (किडनी) के पूर्णतया निष्क्रिय हो जाने के कारण, जिसके लिए पंद्रह वर्षों से अधिक समय से उन्हें दैनिक डायलिसिस (रक्त अपोहन) की आवश्यकता होती है, इसके पश्चात् भी उन्होंने सार्वजनिक संवाद की अपनी दैनिक दिनचर्या को अक्षुण्ण रखा है।[6]

प्रारम्भिक जीवन एवं पृष्ठभूमि

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प्रेमानंद गोविंद शरण का जन्म अनिरुद्ध कुमार पांडेय के रूप में[7] 30 मार्च 1971 को उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के सरसौल प्रशासनिक खण्ड में स्थित एक ग्रामीण ग्राम, अखरी में हुआ था। उनका जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता, शम्भू पांडेय, भक्ति-साधना में संलग्न रहते थे, और उनकी माता, रमा देवी, एक गृहिणी थीं जो नियमित रूप से भ्रमणशील साधु-संतों का आतिथ्य सत्कार करती थीं।[8][9]

उनके परिवार में संन्यास और शास्त्र पठन-पाठन की परम्परा थी। उनके दादा ने पूर्व में ही गृहस्थ जीवन का त्याग कर संन्यास ग्रहण कर लिया था, और उनके बड़े भाई नियमित रूप से श्रीमद्भागवतम् के श्लोकों का सस्वर पाठ करते थे। जीवन वृत्तांतों के अनुसार, अनिरुद्ध का प्रारम्भिक आयु में ही हिन्दू शास्त्रों से परिचय हो गया था। जब वे पाँचवीं कक्षा में थे, तब तक उन्होंने भगवद्गीता और श्री सुखसागर का अध्ययन प्रारम्भ कर दिया था, जो संन्यासी जीवन के प्रति उनकी प्रारम्भिक रुचि को प्रदर्शित करता है।[10]

आध्यात्मिक यात्रा

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वाराणसी में संन्यास

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13 वर्ष की आयु में, अनिरुद्ध ने संन्यासी जीवन व्यतीत करने हेतु कानपुर स्थित अपना गृह त्याग दिया। उन्होंने नैष्ठिक ब्रह्मचारी (आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले तपस्वी) की दीक्षा ग्रहण की और उत्तर प्रदेश के प्रमुख धार्मिक केंद्र वाराणसी (काशी) में प्रस्थान किया।[1]

अपनी युवावस्था में संन्यासी के रूप में जीवन व्यतीत करते प्रेमानंद

वाराणसी में अपने प्रवास के दौरान, वे मुख्य रूप से गंगा नदी के घाटों पर निवास करते थे। संन्यासी समुदाय के अंतर्गत, उन्हें प्रारम्भ में आनंदस्वरूप ब्रह्मचारी नाम प्रदान किया गया था और आगे की दीक्षा प्राप्त करने के पश्चात उन्हें स्वामी आनंदाश्रम के नाम से सम्बोधित किया जाने लगा।[8] कई वर्षों तक, वे पारम्परिक तपस्या में संलग्न रहे, जिसमें ध्यान लगाना, शास्त्रीय हिन्दू दर्शन का अध्ययन करना और स्थानीय निवासियों से प्राप्त 'भिक्षा' पर ही जीवन निर्वाह करना सम्मिलित था। उनके जीवन पर आधारित आख्यानों के अनुसार, वाराणसी में उनकी दिनचर्या में दीर्घकालिक उपवास और एकांतवास सम्मिलित था, जो उस नगर में प्रचलित शैव और वेदान्तिक संन्यासी परम्पराओं की विशेषता है।[10]

वृन्दावन प्रस्थान

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वाराणसी में अपने तपस्या काल के पश्चात, उन्होंने कृष्ण-केन्द्रित वैष्णववाद के धर्मशास्त्रीय केंद्र, वृन्दावन की ओर प्रस्थान किया। उनके आश्रम के आख्यानों के अनुसार, यह प्रस्थान एक सह-संन्यासी के साथ हुई भेंट से प्रेरित था, जिन्होंने उन्हें रासलीला परम्पराओं के दर्शन हेतु वृन्दावन जाने का परामर्श दिया था।[5]

वृन्दावन आगमन पर, उनकी प्रारम्भिक दिनचर्या में वृन्दावन परिक्रमा (नगर की प्रदक्षिणा) करना और बांके बिहारी मंदिर के दर्शन करना सम्मिलित था। तत्पश्चात उनका परिचय श्री राधा वल्लभ मंदिर से हुआ, जिसने उनके धर्मशास्त्रीय दृष्टिकोण को व्यापक रूप से प्रभावित किया।[4]

राधा वल्लभ सम्प्रदाय में दीक्षा

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वे औपचारिक रूप से राधा वल्लभ सम्प्रदाय में सम्मिलित हो गए, जो 16वीं शताब्दी में रहस्यवादी संत हित हरिवंश महाप्रभु द्वारा स्थापित एक हिन्दू सम्प्रदाय है। यह परम्परा अन्य वैष्णव पंथों से इस अर्थ में भिन्न है कि यह राधा को सर्वोच्च धर्मशास्त्रीय महत्त्व प्रदान करती है, और कृष्ण को उनके दिव्य प्रेम (रासोपासना) के अधीन मानती है।[3]

अपने गुरु श्री हित गौरांगी शरण के साथ प्रेमानंद (दाएँ)

उन्होंने अपने आध्यात्मिक गुरु, श्री हित गौरांगी शरण जी महाराज से अपनी औपचारिक दीक्षा और 'शरणागति मंत्र' प्राप्त किया।[11] इसी दीक्षा के दौरान उन्होंने अपनी पूर्ववर्ती संन्यासी उपाधियों का त्याग कर 'श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण' नाम अंगीकार किया।[5]

आश्रम एवं गतिविधियाँ

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वे श्री हित राधा केलि कुंज के प्रमुख हैं, जो वृन्दावन में परिक्रमा मार्ग पर वराह घाट पर स्थित एक आश्रम है। यह आश्रम उनके आध्यात्मिक प्रवचनों और श्री हित राधा केलि कुंज ट्रस्ट की लोकोपकारी (परोपकारी) गतिविधियों के मुख्य केंद्र के रूप में कार्य करता है।[8]

वृन्दावन में परिक्रमा मार्ग पर स्थित श्री हित राधा केलि कुंज आश्रम

आश्रम में दैनिक दिनचर्या प्रातःकाल आरम्भ होती है, जहाँ वे प्रातः 4:15 से 5:45 बजे के मध्य प्रातःकालीन सत्संग (आध्यात्मिक प्रवचन) का संचालन करते हैं। इसके पश्चात, आश्रम में 'एकान्तिक वार्तालाप' आयोजित किया जाता है, जहाँ पूर्व-पंजीकृत आगंतुक अध्यात्म, नैतिकता और व्यक्तिगत संघर्षों से सम्बंधित विशिष्ट प्रश्न पूछते हैं।

यह ट्रस्ट ब्रज क्षेत्र में अनेक धर्मार्थ पहलों का प्रबंधन करता है। इसमें एक दैनिक भंडारा (सामुदायिक भोजनालय) सम्मिलित है, जो तीर्थयात्रियों, साधुओं (तपस्वियों) और स्थानीय विधवाओं को निःशुल्क भोजन प्रदान करता है। आश्रम निःशुल्क चिकित्सालय भी संचालित करता है और निर्धनों को वस्त्र वितरित करता है। आश्रम राजनेताओं, ख्यातिप्राप्त व्यक्तियों या धनवान दानदाताओं को कोई भी विशेषाधिकार युक्त आसन या तीव्र-प्रवेश (फास्ट-ट्रैक एंट्री) प्रदान न करने की नीति का दृढ़ता से पालन करता है; प्रवचनों के दौरान सभी उपस्थित जन एक साथ भूमि पर ही बैठते हैं।[2] विगत वर्षों में, आश्रम ने सार्वजनिक परामर्श (एडवाइजरी) जारी कर भक्तों को उनके नाम पर दान माँगने या सम्पत्ति बेचने वाले कपटपूर्ण संगठनों के विरुद्ध सचेत किया है, तथा यह दोहराया है कि राधा केलि कुंज में सभी सेवाएँ पूर्णतया निःशुल्क हैं।[8]

शिक्षाएँ एवं दर्शन

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उनकी शिक्षाएँ राधा वल्लभ सम्प्रदाय के धर्मशास्त्र पर आधारित हैं। उनका प्राथमिक उपदेश 'राधा-दास्यम' के इर्द-गिर्द केंद्रित है—अर्थात् देवी राधा के प्रति निस्वार्थ सेवाभाव की अवधारणा, जिन्हें यह सम्प्रदाय पूर्ण सर्वोच्च देवत्व के रूप में स्वीकार करता है।

उनके प्रवचन का एक मुख्य तत्त्व 'नाम जप' है, जो प्रत्येक श्वास के साथ "राधा" के दिव्य नाम का निरंतर आंतरिक स्मरण है। वे इसे वर्तमान कलियुग में आध्यात्मिक मोक्ष प्राप्ति का सर्वाधिक सुलभ मार्ग बताते हैं। वे ब्रह्मचर्य और इंद्रिय निग्रह पर भी बल देते हैं, और बहुधा युवा श्रोताओं को शारीरिक ऊर्जा को धार्मिक भक्ति की ओर उन्मुख करने के आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक अनुशासन के विषय में सम्बोधित करते हैं। [12][10] इसके अतिरिक्त, अपने 'एकान्तिक वार्तालाप' सत्रों के दौरान, वे व्यक्तिगत या व्यावसायिक कष्टों का अनुभव करने वाले व्यक्तियों को 'निष्काम कर्म' (फलासक्ति रहित कर्म) के सिद्धांत को लागू करने का परामर्श देते हैं; अर्थात् परिणामों के प्रति आसक्ति के बिना अपने सांसारिक कर्तव्यों का निर्वहन करना और पूर्णतया ईश्वरीय इच्छा ('शरणागति') पर निर्भर रहना।

आध्यात्मिक वृत्तांत एवं शिक्षाएँ

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अपने सार्वजनिक प्रवचनों में, उन्होंने ऐसे व्यक्तिगत अनुभवों को साझा किया है, जिनके विषय में उनका कथन है कि उन्होंने उनकी आध्यात्मिक यात्रा को दिशा प्रदान की।[13] वाराणसी में एक संन्यासी के रूप में आकाश-वृत्ति (बिना भिक्षा माँगे पूर्णतया ईश्वरीय कृपा पर निर्भर रहने की संन्यासी प्रथा) के व्रत के अंतर्गत तपस्या करते समय, उन्होंने हिन्दू देवता शिव के साक्षात् दर्शन का अनुभव सुनाया। उनके अनुसार, इस साक्षात्कर ने एक उत्प्रेरक के रूप में कार्य किया, जिसने उन्हें वृन्दावन प्रस्थान करने और अपना जीवन राधा व कृष्ण की उपासना हेतु समर्पित करने का निर्देश दिया।

उनकी शिक्षाएँ आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करने के लिए बहुधा इन प्रसंगों का उपयोग करती हैं। उन्होंने गंगा के तट पर हुई एक घटना का वर्णन किया है, जहाँ एक मद्यपान किये हुए व्यक्ति ने उनके पास आकर उन्हें आध्यात्मिक सहनशीलता ('तितिक्षा') का महत्त्व सिखाया था। उस व्यक्ति ने समीप के एक मंदिर की ओर संकेत करते हुए कहा कि पूजनीय विग्रह (मूर्ति) और फर्श दोनों बिल्कुल एक ही संगमरमर से बने हैं; तथापि, केवल वही पत्थर देवत्व को प्राप्त हुआ जिसने मूर्तिकार की छेनी-हथौड़े की पीड़ादायक चोटों को सहन किया।[14]

उनके सार्वजनिक प्रवचनों में अन्य सूक्ष्म प्रसंग भी सम्मिलित हैं, जैसे वृन्दावन की एक स्थानीय बालिका, जिसके क्षेत्रीय बोली में पूछे गए एक संक्षिप्त प्रश्न—"जायगो बाबा?" (क्या आप जाएँगे बाबा?)—ने उन्हें नगर छोड़ने की अपनी योजना परिवर्तित करने के लिए प्रेरित किया। इसके अतिरिक्त, वे गोवर्धन पर्वत की कठोर 'दंडवत परिक्रमा' के दौरान एक प्रसंग का वर्णन करते हैं, जहाँ एक रुपये की याचना करने वाले एक छोटे बालक को उनके और उनके गुरु द्वारा साक्षात् कृष्ण का स्वरूप माना गया था।[15]

सार्वजनिक उपस्थिति एवं मीडिया

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यद्यपि राधा वल्लभ सम्प्रदाय के पारम्परिक संतों ने ऐतिहासिक रूप से एकांत और गुमनामी को प्राथमिकता दी है, किन्तु यूट्यूब और इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया मंचों पर अपने वीडियो के प्रसार के कारण उन्होंने विशाल जनसमूह (अनुयायी) प्राप्त कर लिया है। उनका आधिकारिक यूट्यूब चैनल, भजन मार्ग, लाखों ग्राहकों तक उनके दैनिक प्रवचनों और प्रश्नोत्तर सत्रों का प्रसारण करता है।[6]

पारम्परिक हिन्दू शास्त्रों के दृष्टिकोण से आधुनिक मनोवैज्ञानिक और जीवनशैली संबंधी समस्याओं को प्रत्यक्ष रूप से सम्बोधित करने की उनकी पद्धति ने युवा व्यवसायियों के वर्ग को आकर्षित किया है। परिणामस्वरूप, उनका आश्रम मार्गदर्शन की खोज में आने वाले उच्च-स्तरीय सार्वजनिक व्यक्तियों हेतु एक प्रमुख गंतव्य बन गया है।[1]

राधा केलि कुंज आने वाले उल्लेखनीय आगंतुकों में भारतीय राष्ट्रीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान विराट कोहली और उनकी पत्नी, बॉलीवुड अभिनेत्री अनुष्का शर्मा सम्मिलित हैं,[16] जिनकी यात्राओं को मीडिया में व्यापक कवरेज प्राप्त हुआ जब उनके चित्र अन्य उपस्थित जनों के साथ फर्श पर नंगे पैर बैठे हुए प्रकाशित हुए।[17][18] उनसे सार्वजनिक रूप से भेंट करने वाली अन्य प्रमुख हस्तियों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत, गायक बी प्राक और अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी सम्मिलित हैं।[6]

सामाजिक दृष्टिकोण एवं प्रतिक्रिया

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मंदिर परिधान पर टिप्पणियाँ

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नवम्बर 2024 में, मंदिरों में महिलाओं द्वारा छोटे वस्त्र धारण करने के विषय में एक मंदिर के पुजारी के साथ प्रश्नोत्तर सत्र के दौरान, प्रेमानंद ने कहा कि व्यक्तियों को आगंतुकों की वेशभूषा पर विवाद करने के स्थान पर सर्वप्रथम अपनी दृष्टि को अनुशासित करना चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि परिधान पर धार्मिक मार्गदर्शन तभी प्रदान किया जाना चाहिए जब विशेष रूप से उसकी याचना की जाए।[19]

संबंधों पर 2025 की टिप्पणियाँ

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जुलाई 2025 में, सोशल मीडिया पर एक वीडियो प्रसारित हुआ जिसमें प्रेमानंद ने समकालीन संबंधों और यौन नैतिकता पर विचार व्यक्त किए। उस दृश्य-श्रव्य (रिकॉर्डिंग) में, उन्होंने वैवाहिक निष्ठा पर टिप्पणी की, यह प्रश्न उठाया कि क्या पूर्व में एकाधिक साझेदारों (पार्टनर्स) वाले व्यक्ति निष्ठावान विवाह को बनाए रख सकते हैं, और लिव-इन रिलेशनशिप (सहजीवन) की आलोचना की।[20]

इन टिप्पणियों की जनता के कुछ वर्गों, सामाजिक टिप्पणीकारों और महिला अधिकार संगठनों द्वारा आलोचना की गई, जबकि अनेक धार्मिक हस्तियों ने उनके विचारों का समर्थन किया।[21] उनके वक्तव्यों के इर्द-गिर्द सार्वजनिक चर्चा के उपरान्त, स्थानीय मीडिया ने सूचना दी कि फेसबुक पर उनके विरुद्ध हत्या की धमकी दी गई थी।[22]

स्वास्थ्य स्थिति

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उन्हें 'ऑटोसोमल डोमिनेंट पॉलीसिस्टिक किडनी डिजीज' (एडीपीकेडी) से ग्रसित पाया गया है, जो एक आनुवंशिक विकार है जिसके कारण वृक्क (गुर्दों) में सिस्ट (गाँठों) के गुच्छे विकसित हो जाते हैं। इस स्थिति के परिणामस्वरूप लगभग 15 से 20 वर्ष पूर्व उनके वृक्क पूर्णतया निष्क्रिय हो गए थे।[6] वे प्रतिदिन डायलिसिस उपचार से गुजरते हैं, जो पाँच घंटे तक चलता है।[1]

रोग निदान (बीमारी का पता चलने) के पश्चात से, अनेक भक्तों ने प्रत्यारोपण हेतु अपने वृक्क दान करने का प्रस्ताव दिया है। सितम्बर 2024 में, ब्रिटिश-भारतीय व्यवसायी राज कुंद्रा ने सार्वजनिक रूप से संन्यासी को वृक्क दान करने की पेशकश की थी।[23] तथापि, उन्होंने अंग दान के सभी प्रस्तावों को निरंतर अस्वीकार किया है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपने स्वयं के जीवन की रक्षा हेतु किसी अन्य व्यक्ति को शारीरिक क्षति या कष्ट पहुँचाने से मना कर दिया है, और इसके स्थान पर अपनी शारीरिक क्षीणता को ईश्वर की इच्छा मानकर स्वीकार करने की प्राथमिकता व्यक्त की है।[1]

ग्रन्थसूची

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श्री हित राधा केलि कुंज ट्रस्ट के अंतर्गत उनकी शिक्षाओं और प्रवचनों के अनेक संकलन प्रकाशित हुए हैं:

  • ब्रह्मचर्य - कब, क्यों और कैसे? (2025) – ISBN 978-81-980039-1-1
  • सेलिबेसी - व्हेन, व्हाई एंड हाउ? (2025) – ISBN 978-81-980039-0-4
  • श्री हित हरिवंश चरितामृत (2025) – ISBN 978-81-980039-9-7
  • स्पिरिचुअल अवेकनिंग (खंड 1) (2024) – ISBN 978-81-971056-5-4
  • 365 डिवाइन सूत्रास कोटेशन (2026) – ISBN 978-81-996765-1-0

इन्हें भी देखें

सन्दर्भ

बाहरी कड़ियाँ

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बलुवाना न्यूज 6 कोरोना वायरस का प्रसार:बीते 24 घंटे में देश में 19,100 नया केस, महाराष्ट्र-केरल के ब

बलुवाना न्यूज पंजाब ऑटो डेस्क : बदलती टेक्नोलॉजी में हर दिन कुछ न कुछ नया देखने को मिल रहा है। ऑटोमोबाइल सेक्टर भी काफी प्रयोग किए जा रहे हैं। आजतक आपने गोबर का इस्तेमाल ईंधन में होते सुना और देखा भी होगा लेकिन क्या आपने कभी गोबर से चलता ट्रैक्टर देखा है क्या? वैज्ञानिकों ने गोबर से चलने वाला ट्रैक्टर बनाया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस ट्रैक्टर को ब्रिटिश कंपनी बेनामन (Bennamann) ने बनाया है। इस ट्रैक्टर का नाम New Holland T7 है। इस ट्रैक्टर में डीजल की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। आइए जानते हैं आखिर गोबर से कैसे चलेगा यह ट्रैक्टर.. 270 हॉर्सपावर, डीजल की छुट्टी खेती में गोबर की जरूरत काफी होती है। जैविक खेती के तौर पर गोबर का यूज होता रहा है। ऐसे में गोबर से चलने वाला ट्रैक्टर आने से गोबर की अहमियत बढ़ने की संभावना है। यह ट्रैक्टर 270 हॉर्सपावर का है और डीजल ट्रैक्टर की तरह ही काम करता है। गोबर का ही इस्तेमाल क्यों दरअसल, गाय के गोबर में फ्यूजिटिव मीथेन गैस पाई जाती है। बाद में यह बायोमीथेन ईंधन में बदल जाती है। इससे किसानों का काम काफी आसान हो जाने की बात कही जा रही है। इससे पॉल्युशन रोकने में भी मदद मिलेगी। बायोमीथेन फ्यूज का यूज एक्सपर्ट्स के मुताबिक, गाय के गोबर से जो बायोमीथेन ईंधन तैयार होता है, उससे 270 BHP का ट्रैक्टर आसानी से चलाया जा सकता है। ब्रिटेन के साइंटिस्ट ने इस ट्रैक्टर को बनाने का काम किया है। यह उसी तरह काम करेगा, जिस तरह से CNG की गाड़ियां काम करती हैं। किस तरह काम करेगा यह ट्रैक्टर इस ट्रैक्टर को चलाने के लिए गायों के गोबर को इकट्ठा कर उसे बायोमीथेन (Positive Methane) में बदला गया। इसके लिए ट्रैक्टर में एक क्रॉयोजेनिक टैंक भी वैज्ञानिकों ने लगाया है। जिसमें गोबर से तैयार बायोमीथेन फ्यूल का यूज किया जाता है। क्रॉयोजेनिक टैंक (cryogenic tank) 162 डिग्री के टेंपरेचर में बायोमीथेन को लिक्विफाइड करने का काम करता है। खेती-किसानी होगा आसान इस ट्रैक्टर का टेस्ट कॉर्नवॉल (Cornwall) के एक खेत में किया गया है। इसका फायदा ये हुआ कि सिर्फ एक साल में ही कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन 2,500 टन से घटकर 500 टन हो गया। इस ट्रैक्टर के आने से खेती-किसानी आसान होगी और डीजल पर आने वाला खर्च कम होगा।

   बलुवाना न्यूज पंजाब ऑटो डेस्क : बदलती टेक्नोलॉजी में हर दिन कुछ न कुछ नया देखने को मिल रहा है। ऑटोमोबाइल सेक्टर भी काफी प्रयोग किए जा रहे हैं। आजतक आपने गोबर का इस्तेमाल ईंधन में होते सुना और देखा भी होगा लेकिन क्या आपने कभी गोबर से चलता ट्रैक्टर देखा है क्या? वैज्ञानिकों ने गोबर से चलने वाला ट्रैक्टर बनाया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस ट्रैक्टर को ब्रिटिश कंपनी बेनामन (Bennamann) ने बनाया है। इस ट्रैक्टर का नाम New Holland T7 है। इस ट्रैक्टर में डीजल की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।   आइए जानते हैं आखिर गोबर से कैसे चलेगा यह ट्रैक्टर.. 270 हॉर्सपावर, डीजल की छुट्टी खेती में गोबर की जरूरत काफी होती है। जैविक खेती के तौर पर गोबर का यूज होता रहा है। ऐसे में गोबर से चलने वाला ट्रैक्टर आने से गोबर की अहमियत बढ़ने की संभावना है। यह ट्रैक्टर 270 हॉर्सपावर का है और डीजल ट्रैक्टर की तरह ही काम करता है। गोबर का ही इस्तेमाल क्यों दरअसल, गाय के गोबर में फ्यूजिटिव मीथेन गैस पाई जाती है। बाद में यह बायोमीथेन ईंधन में बदल जाती है। इससे किसानों का काम काफी आसान हो जाने की बात कही जा रह...

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,,आप पारद शिवलिंग में पारे के ठोस अवस्था में रूपांतरण की व्याख्या कैसे करेंगे? By वनिता कासनियां पंजाब पारद शिवलिंग को भगवान शिव का स्वरूप माना गया है। ताम्र को माता पार्वती का स्वरूप माना जाता है। इन दोनों के समन्वय से शिव और शक्ति का सशक्त रूप उभर कर सामने आ जाता है।सभी शिवलिंगों में पारद के शिवलिंग का स्थान सबसे ऊपर है इसका कारण है इसकी पूजन करने के लाभपारद शिवलिंग की महिमा अलग है। ठोस पारद के साथ ताम्र को जब उच्च तापमान पर गर्म करते हैं तो ताम्र का रंग स्वर्णमयी हो जाता है। इसीलिए ऐसे शिवलिंग को "सुवर्ण रसलिंग" भी कहते हैं। पारद शिव लिंग की महिमा का वर्णन रूद्र संहिता, पारद संहिता, रसमार्तंड ग्रन्थ, ब्रह्म पुराण, शिव पुराण आदि में मिलता है। योग शिखोपनिषद ग्रन्थ में पारद के शिवलिंग को स्वयंभू भोलेनाथ का प्रतिनिधि माना गया है। इस ग्रन्थ में इसे "महालिंग" की उपाधि मिली है और इसमें शिव की समस्त शक्तियों का वास मानते हुए पारद से बने शिवलिंग को सम्पूर्ण शिवालय की भी मान्यता मिली है ।पारा को धातुओं में सर्वोत्तम माना गया है। यह अपनी चमत्कारिक और हीलिंग प्रापर्टीज के लिए वैज्ञानिक तौर पर भी मशहूर है। पारद के शिवलिंग को शिव का स्वयंभू प्रतीक भी माना गया है। रूद्र संहिता में रावण के शिव स्तुति की जब चर्चा होती है तो पारद के शिवलिंग का विशेष वर्णन मिलता है।अगर आप अध्यात्म पथ पर आगे बढऩा चाहते हों, योग और ध्यान में आपका मन लगता हो और मोक्ष के प्राप्ति की इच्छा हो तो आपको पारे से बने शिवलिंग की पूजा एवं उपासना करनी चाहिए। ऐसा करने से आपको मोक्ष की प्राप्ति भी हो सकती है।यदि आपको जीवन में कष्टों से मुक्ति नहीं मिल रही हो, लोग आपसे विश्वासघात कर देते हों तो पारद के शिवलिंग को यथाविधि शिव परिवार के साथ पूजन करें। ऐसा करने से आपकी समस्त कष्ट दूर हो जायेगे।संकटों से मुक्ति के लिए किसी भी माह में प्रदोष के दिन पारद के शिवलिंग की षोडशोपचार पूजा करके शिव महिमा मन्त्र से अभिषेक करें। फिर हर दिन पूजन करते रहें, कुछ ही समय में आर्थिक स्थिति ठीक होने लगती है। कर्ज मुक्ति होती है।अगर आपके घर या व्यापार स्थल पर अशांति, क्लेश आदि बना रहता हो। तो पारद के शिवलिंग की पूजा करे।आप को नींद ठीक से नहीं आती हो, घर के सदस्यों में टकराव और वैचारिक मतभेद बना रहता हो तो आपको पारद निर्मित एक कटोरी में जल डाल कर घर के मध्य भाग में रखना चाहिए। उस जल को रोज़ बाहर किसी गमले में डाल देना चाहिए। ऐसा करने से धीरे-धीरे घर में सदस्यों के बीच में प्रेम बढऩा शुरू हो जाएगा और मानसिक शान्ति की अनुभूति भी होगी। मेरे घर मे जो जल पारद के शिवलिंग पर चढ़ता है, वही गमले मे डाल दिया जाता है।पारद शिवलिंग का विधिपूर्वक पूजन करने से समस्त दोषों से मुक्ति मिल जाती है। इसका यथाविधि पूजन करने से मानसिक, शारीरिक, तामसिक या अन्य कई विकृतियां स्वत: ही समाप्त हो जाती हैं। घर में सुख और समृद्धि बनी रहती है।पारद के शिवलिंग के दर्शन मात्र से आपकी सभी इच्छा पूरी हो जाती हैं। इनकी पूजा करने से स्वास्थ्य और धन-यश की इच्छा पूर्ण होती है।जो भी भक्त पारद शिवलिंग की पूजा करते हैं, उनकी रक्षा स्वयं महाकाल और महाकाली करते हैं।इस शिवलिंग के स्पर्श मात्र से दैवीय शक्तियां व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर जाती हैं।आत्मविश्वास की कमी है तो करे पारद के शिवलिंग की पूजा। जो लोग अपनी बात सार्वजनिक रूप से खुलकर नही रख पाते है।लोग आपको दब्बू की संज्ञा देते हैं तो आपको नियमित रूप से पारद शिवलिंग की पूजा करना चाहिए। इससे मस्तिष्क को उर्वरता प्राप्त होती है। वाक सिद्धि प्राप्त होती है। हजारों लोगों को अपनी वाणी से सम्मोहित करने की क्षमता आ जाती है।पारद शिवलिंग की पूजा करने से धन से संबंधित, परिवार से संबंधित, स्वास्थ्य से संबंधित और आपके जीवन से जुड़ी हुई हर छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी समस्या का अंत होता है।यह शिवलिंग घर की बुरी शक्तियों को दूर करती है |किसी भी तरह का जादू टोना घर के सदस्यों पर होने से रोकता है |परिवार के सदस्यों को असीम शांति और सौभाग्य की प्राप्ति होती है |यह घर के सभी प्रकार के वास्तु दोष को दूर करता हैअगर घर का कोई सदस्य बीमार हो जाए तो उसे पारद शिवलिंग पर अभिषेक किया हुआ पानी पिलाने से वह ठीक होने लगता है।यदि किसी को पितृ दोष हो तो उसे प्रतिदिन पारद शिवलिंग की पूजा करनी चाहिए। इससे पितृ दोष समाप्त हो जाता है।य़दि बहुत प्रचण्ड तान्त्रिक प्रयोग या अकाल मृत्यु या वाहन दुर्घटना योग हो तो ऐसा शुद्ध पारद शिवलिंग उसे अपने ऊपर ले लेता है | ऐसी स्थिति में यह अपने आप टूट जाता है, और साधक की रक्षा करता है |ऐसे करे पारद के शिवलिंग की पूजासर्वप्रथम शिवलिंग को सफेद कपड़े पर आसन पर रखें।स्वयं पूर्व-उत्तर दिशा की ओर मुँह करके बैठ जाए।अपने आसपास जल, गंगाजल, रोली, मोली, चावल, दूध और हल्दी, चन्दन रख लें।सबसे पहले पारद शिवलिंग के दाहिनी तरफ दीपक जला कर रखो।थोडा सा जल हाथ में लेकर तीन बार निम्न मन्त्र का उच्चारण करके पी लें।प्रथम बार ॐ मुत्युभजाय नम:दूसरी बार ॐ नीलकण्ठाय: नम:तीसरी बार ॐ रूद्राय नम:चौथी बार ॐशिवाय नम:हाथ में फूल और चावल लेकर शिवजी का ध्यान करें और मन में ''ॐ नम: शिवाय`` का 5 बार स्मरण करें और चावल और फूल को शिवलिंग पर चढ़ा दें।इसके बाद ॐ नम: शिवाय का निरन्तर उच्चारण करते रहे।फिर हाथ में चावल और पुष्प लेकर ''ॐ पार्वत्यै नम:`` मंत्र का उच्चारण कर माता पार्वती का ध्यान कर चावल पारा शिवलिंग पर चढ़ा दें।इसके बाद ॐ नम: शिवाय का निरन्तर उच्चारण करें।फिर मोली को और इसके बाद बनेऊ को पारद शिवलिंग पर चढ़ा दें।इसके पश्चात हल्दी और चन्दन का तिलक लगा दे।चावल अर्पण करे इसके बाद पुष्प चढ़ा दें।मीठे का भोग लगा दे।भांग, धतूरा और बेलपत्र शिवलिंग पर चढ़ा दें।फिर अन्तिम में शिव की आरती करे और प्रसाद आदि ले लो।जो व्यक्ति इस प्रकार से पारद शिवलिंग का पूजन करता है इसे शिव की कृपा से सुख समृद्धि आदि की प्राप्ति होती है।मेरे घर के पारद के शिवलिंगमेरे घर के पूजा घर के दो जगहों पर दो पारद के शिवलिंग थे । एक पूजा घर से चोरी हो गया या ग़ायब हो गया नही पता चला।उस शिवलिंग का पता नही चला उसकी मैं पूजा और ध्यान किया करता था। मुझे काफी लाभ मिला था । उस शिवलिंग पर मुझे बहुत श्रद्धा थी। चोरी हो गया अफसोस है , शायद मुझसे ज्यादा उसको जरूरत होगी ।ये पारद शिवलिंग है मेरे घर के पूजा घर मे है ।पारद का शिवलिंग बहुत कम देखने को मिलता है , पारद का शिवलिंग बनाने की एक विधि होती है । मेरे गुरुजी के शिष्य ने ये विद्या गुरुजी से सीखी थी , उन्होंने बना कर दो हम लोगो को दिया था , एक छोटा था , एक बड़ा था । उस शिष्य ने जब इस विद्या का धंधा शुरू कर दिया तो गुरुजी ने उसे आश्रम से निकाल दिया तब से आज तक उससे मुलाकात नही हो पाई।पारद के शिवलिंग का महत्वप्राचीन ग्रंथों में पारद को स्वयं सिद्ध धातु माना गया है। इसका वर्णन चरक संहिता आदि महत्वपूर्ण ग्रन्थों में भी मिलता है। शिवपुराण में पारद को शिव का वीर्य कहा गया है। वीर्य बीज है, जो संपूर्ण जीवों की उत्पत्ति का कारक है। इसी के माध्यम से भौतिक सृष्टि का विस्तार होता है। पारे को प्राकृतिक रूप से प्रबल ऊर्जा प्रदान करने वाला रासायनिक तत्व कहा गया है। पारे से बने शिवलिंग को समस्त प्रकार की वस्तुओं से बने शिवलिंगों में सर्वश्रेष्ठ कहा गया है और इसकी पूजा सर्वमनोकामना पूर्ण करने वाली कही गई है। ग्रंथों में शिव लिंग को ब्रम्हांड का प्रतीक माना गया है। जानकारों के अनुसार रुद्र संहिता में शिव लिंगों के भी प्रकार बताए गए हैं, जो सृष्टि में व्याप्त अलग-अलग ब्रम्हांडों के प्रतीक माने जाते हैं। वैदिक ग्रंथों में पारे को संसार के समस्त राग, द्वेष, विकार का विनाशक माना गया है। जो लोग अध्यात्म की राह पर चलना चाहते हैं, उनके लिए पारद शिवलिंग की पूजा अवश्य करना चाहिए। समस्त प्रकार के सांसारिक सुखों की प्राप्ति के लिए भी पारद शिवलिंग की पूजा की जाती है। शास्त्रों में इस बात का भी उल्लेख है कि पारे के शिव लिंग को यदि निश्चित आकार में घर पर रखा जाए तो सारे वास्तुदोष्ज्ञ स्वत: समाप्त हो जाते हैं। इस शिवलिंग को पूरे शिव परिवार के साथ रखा जाना चाहिए। पूजन विधि में, समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति में पारद से बने शिवलिंग एवं अन्य आकृतियों का विशेष महत्व होता है।सरल नही है पारद का शिवलिंग बनानापारद शिव लिंग का निर्माण क्रमशः तीन मुख्य धातुओ के रासायनिक संयोग से होता है. “अथर्वन महाभाष्य में लिखा है क़ि-“द्रत्यान्शु परिपाकेनलाब्धो यत त्रीतियाँशतः. पारदम तत्द्वाविन्शत कज्जलमभिमज्जयेत. उत्प्लावितम जरायोगम क्वाथाना दृष्टोचक्षुषः तदेव पारदम शिवलिंगम पूजार्थं प्रति गृह्यताम।इस प्रकार कम से कम सत्तर प्रतिशत पारा, सोना, चाँदी,ताबा, पंद्रह प्रतिशत मणि फेन या मेगनीसियम तथा दस प्रतिशत कज्जल या कार्बन तथा पांच प्रतिशत अंगमेवा या पोटैसियम कार्बोनेट होना चाहिए। इन सब को मिलाकर ठोस रूप दिया जाता है।पारद का शोधन अत्यंत कठिन कार्य होता है। इसको शोधित करने जैसी कठिन एवं जटिल प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, तब जाकर पारा ठोस आकार ग्रहण करता है पारद शिवलिंग बनाने की एक विद्या होती है जिसको सीखना पड़ता है । इसे ठोस बनाने के लिए वैदिक क्रियाओं सहित चौसठ दिव्य औषधियों का मिश्रण करना पड़ता है। निर्माण के बाद उसे मांत्रिक क्रियाओं के जरिए रससिद्ध एवं चैतन्य किया जाता है, तब जाकर पारद शिवलिंग पूर्ण सक्षम एवं प्रभावयुक्त बनता है तो उसकी पूजा होती है। असली पारद शिवलिंग का निर्माण एक विशेष समय अवधि में ही होता है | इस विशेष समय को विजयकाल के नाम से जाना जाता है | बाजार में दिखावे के भी पारद शिवलिंग भी मिलते है जो ठग विद्या के लिए बने है | इन्हे खरीदने से पहले इनकी अच्छे से जांच कर लेनी चाहिएवनिता कासनियां पंजाबकहाँ होता है निर्माणभोपाल से 142 किमी दूर नर्मदा नदी के किनारे बने बापौली-मांगरोल आश्रम में इन दिनों पारद शिवलिंग बनाए जा रहे हैं। 8 महीने में 64 जड़ी-बूटियों के साथ सोना-चांदी-ताबा मिलाकर इन्हें तैयार किया जा रहा है। इनकी कीमत 11000 रुपए से शुरू होकर 1 करोड़ तक होती है। यहाँ साल भर में 30 से 35 पारद शिवलिंग बनते है। रायसेन जिले के बरेली तहसील में नर्मदा किनारे मांगरौल आश्रम बना है। यहां बरसों से पारद शिवलिंग बनाया जाता है। देश के कई हिस्सों से लोग साल भर यहां शिवलिंग बनवाने आते हैं। ये काम पूरे साल चलता रहता है। सावन सोमवार और महाशिवरात्रि आने पर इनकी मांग बढ़ जाती है। पारद शिवलिंग को बनाना बेहद मुश्किल काम है। बिना किसी मशीनी मदद से पारे को साफ करने के लिए 8 संस्कार किए जाते हैं। अष्ट संस्कार में 6 महीने लग जाते हैं। 2 महीने 15 दिन से लगते हैं बाकी क्रियाओं में और इसके बाद पारद शिवलिंग बन कर तैयार होता है बाद सभी 64 औषधियां मिलाकर पारद को ठोस बनाया जाता है। कपारद का प्रभाव बढ़ाने के लिए सोना-चांदी भी मिलाया जाता है।स्रोत इमेज गूगल/ मेरा फोनस्रोत लिंकसमस्त सुखों की प्राप्ति के लिए कीजिए पारद शिवलिंग की पूजापारद शिवलिंग का महत्व महिमा और इसे पूजने से होने वाले लाभघर में रखें पारद शिवलिंग, जानें इनकी पूजा के कितने हैं फायदेपारद शिवलिंगपारद शिवलिंग

,, आप पारद शिवलिंग में पारे के ठोस अवस्था में रूपांतरण की व्याख्या कैसे करेंगे? By वनिता कासनियां पंजाब पारद शिवलिंग को भगवान शिव का स्वरूप माना गया है। ताम्र को माता पार्वती का स्वरूप माना जाता है। इन दोनों के समन्वय से शिव और शक्ति का सशक्त रूप उभर कर सामने आ जाता है। सभी शिवलिंगों में पारद के शिवलिंग का स्थान सबसे ऊपर है इसका कारण है इसकी पूजन करने के लाभ पारद शिवलिंग की महिमा अलग है। ठोस पारद के साथ ताम्र को जब उच्च तापमान पर गर्म करते हैं तो ताम्र का रंग स्वर्णमयी हो जाता है। इसीलिए ऐसे शिवलिंग को "सुवर्ण रसलिंग" भी कहते हैं। पारद शिव लिंग की महिमा का वर्णन रूद्र संहिता, पारद संहिता, रसमार्तंड ग्रन्थ, ब्रह्म पुराण, शिव पुराण आदि में मिलता है। योग शिखोपनिषद ग्रन्थ में पारद के शिवलिंग को स्वयंभू भोलेनाथ का प्रतिनिधि माना गया है। इस ग्रन्थ में इसे "महालिंग" की उपाधि मिली है और इसमें शिव की समस्त शक्तियों का वास मानते हुए पारद से बने शिवलिंग को सम्पूर्ण शिवालय की भी मान्यता मिली है । पारा को धातुओं में सर्वोत्तम माना गया है। यह अपनी चमत्कारिक और हीलिंग प्रापर्टीज क...